<p><strong>Authors:</strong> विनीता अवस्थी (शोधार्थी विधि विभाग, मेजर एस०डी०सिंह विश्वविद्यालय, फर्रुखाबाद), डॉ० मयंक कुमार (सहा० आचार्य, विधि विभाग, मेजर एस०डी०सिंह विश्वविद्यालय, फर्रुखाबाद)</p>
<p><strong>Journal:</strong> Journal of Mass Media and Management, Issue-3, ISSN: 3049-3021 (Online)</p>
<h2>सारांश</h2>
<p>ऑनर किलिंग भारतीय समाज में एक गहन सामाजिक मनोवैज्ञानिक संकट है, जो पारिवारिक प्रतिष्ठा और परंपरागत मान्यताओं के नाम पर घटित होता है। यह अपराध न केवल जीवन की हानि करता है, बल्कि परिवार और समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। भय, अपराधबोध, सामाजिक अलगाव और पीढ़ीगत आघात इसके प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणाम हैं। शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन माना गया है, क्योंकि यह लैंगिक समानता, मानवाधिकारों की जागरूकता और तार्किक सोच को बढ़ावा देती है। विधिक सुधार भी उतने ही आवश्यक हैं। भारतीय दंड संहिता और अब Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 के प्रावधान ऑनर किलिंग को हत्या की श्रेणी में रखते हुए कठोर दंड का मार्ग प्रशस्त करते हैं। न्यायालयों ने भी बार बार इस अपराध की निंदा की है और पीड़ितों को संरक्षण देने की आवश्यकता पर बल दिया है। तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह एक वैश्विक समस्या है, जिसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर कानून और सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भी ऑनर किलिंग को रोकने में सहायक हो सकती है। AI आधारित डेटा विश्लेषण और पूर्वानुमान प्रणाली संभावित पीड़ितों की पहचान कर सकती है और सुरक्षा प्रदान कर सकती है। साथ ही, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म समाज में शिक्षा और जागरूकता फैलाने में मदद कर सकते हैं। इस प्रकार AI और मानवता का समन्वय ऑनर किलिंग जैसी अमानवीय प्रथाओं को समाप्त करने में योगदान दे सकता है। अंततः यह शोधपत्र दर्शाता है कि ऑनर किलिंग को समाप्त करने के लिए शिक्षा, विधिक सुधार, मनोवैज्ञानिक परामर्श और तकनीकी नवाचार का समन्वय आवश्यक है। जब समाज में समानता, स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की गहरी समझ विकसित होगी, तभी इस अमानवीय प्रथा का अंत संभव होगा।</p>
<p><strong>कीवर्ड (Keywords):</strong> ऑनर किलिंग, मनोवैज्ञानिक प्रभाव, शिक्षा, विधिक सुधार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)</p>
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