<p><strong>Authors:</strong> डॉ. प्रीति सिंह (सहायक प्राध्यापक, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, कला एवं सामाजिक विज्ञान संकाय, स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ)</p>
<p><strong>Journal:</strong> Journal of Mass Media and Management, Issue-3, ISSN: 3049-3021 (Online)</p>
<h2>सारांश</h2>
<p>संत कबीर भारतीय समाज के ऐसे महान संत-कवि थे, जिन्होंने अपनी वाणी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और जाति-पाँति की संकीर्णताओं का विरोध किया। कबीर की वाणी केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक और संवादपरक भी रही। उनके दोहे और साखियाँ सीधे-सीधे जनमानस से संवाद करती हैं, जो किसी जटिल शास्त्रीय भाषा में न होकर आमजन की बोली में रची-बसी हैं। इस दृष्टि से कबीर की वाणी को जनसंचार का एक सशक्त माध्यम माना जा सकता है। यह शोध-पत्र कबीर की वाणी में निहित समाज सुधारक संदेशों का विश्लेषण करता है और यह समझने का प्रयास करता है कि किस प्रकार कबीर ने बिना किसी औपचारिक मंच या आधुनिक तकनीक के, केवल अपनी संवाद शैली और सरल भाषा के बल पर व्यापक जनसमूह तक अपनी बात पहुँचाई। कबीर का संवाद लोक परंपरा, प्रतीकात्मक भाषा, व्यंग्य और प्रश्नोत्तरी शैली पर आधारित था, जो आज भी संचार के प्रभावी रूपों में गिना जा सकता है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि कबीर की वाणी किस प्रकार जनसंचार के लोक माध्यमों की अग्रदूत रही और कैसे उनकी समाज सुधारक चेतना आज के संचार माध्यमों एवं पत्रकारिता के लिए भी प्रेरणास्रोत है।</p>
<p><strong>कीवर्ड (Keywords):</strong> संत कबीर, समाज सुधारक संवाद, जनसंचार, कबीर की वाणी और पत्रकारिता</p>
<p><a href=”https://jmmm.in/wp-content/uploads/2026/10/JMM07092026_DrPreeti.pdf” target=”_blank”>📥 Download Full-Text PDF</a></p>