पर्यावरण संचार के अग्रदूतः महात्मा गांधी द्वारा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों में प्रस्तुत सतत विकास का दृष्टिकोण

<p><strong>Authors:</strong> अरुण कुमार (असिस्टेंट प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग आईएमएस नोएडा), डॉ. कुमारी पल्लवी (असिस्टेंट प्रोफेसर, मीडिया स्टडीज विभाग, स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज, क्राइस्ट डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी, दिल्ली एनसीआर), हर्षित कुमार (शोधार्थी हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय)</p>
<p><strong>Journal:</strong> Journal of Mass Media and Management, Issue-3, ISSN: 3049-3021 (Online)</p>

<h2>सारांश</h2>
<p>पर्यावरण संकट आज मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का हास और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक विकास मॉडल प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में विफल रहा है। ऐसे समय में महात्मा गांधी के विचार न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि दिशा-सूचक भी हैं। गांधी ने पर्यावरण को कभी अलग विषय नहीं माना। उनके लिए सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और स्वदेशी के सिद्धांत ही टिकाऊ जीवन शैली की नींव थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी जी ने अपने इन विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रिंट मीडिया को सबसे सशक्त माध्यम के तौर पर चुना। समाचार पत्र, पत्रिकाएँ और पुस्तकें गांधी जी के लिए केवल सूचना के साधन नहीं थे, बल्कि वे जन-जागरण, नैतिक शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के हथियार थे।</p>

<p><strong>कीवर्ड (Keywords):</strong> महात्मा गांधी, पर्यावरणीय आंदोलन, स्वराज, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, पर्यावरण संकट, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, आत्मनिर्भर भारत, सतत विकास</p>

<p><a href=”https://jmmm.in/wp-content/uploads/2026/10/JMM05092026_Arun.pdf&#8221; target=”_blank”>📥 Download Full-Text PDF</a></p>

Leave a Reply